सत्र न्यायालय से जमानत खारिज? धारा 483 बीएनएसएस के अंतर्गत इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जमानत
उत्तर प्रदेश में सत्र न्यायालय से जमानत खारिज होने के बाद सामान्य रास्ता बीएनएसएस की धारा 483 के अंतर्गत इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जमानत अर्जी है। इस लेख में बताया गया है कि यह अर्जी कैसे काम करती है, राज्य, सूचनादाता और पीड़ित को सूचना, एससी/एसटी एक्ट के मामलों में अपील का रास्ता, उच्च न्यायालय किन बातों पर विचार करता है, कितना समय लगता है, और आगे क्या विकल्प हैं।
जब सत्र न्यायालय जमानत अर्जी खारिज कर देता है, तो अभियुक्त और उसके परिवार के सामने पहला प्रश्न यही होता है कि क्या अब उच्च न्यायालय जाया जा सकता है, और कितनी जल्दी। उत्तर प्रदेश में इसका सामान्य रास्ता इलाहाबाद उच्च न्यायालय में, ज़िले के अनुसार प्रयागराज या लखनऊ खंडपीठ में, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 483 के अंतर्गत जमानत अर्जी दाखिल करना है। यह धारा दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) की धारा 439 के समान है।
इस लेख में बताया गया है कि यह अर्जी कैसे काम करती है, जमानत से पहले किसे सूचना (नोटिस) देनी होती है, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के मामलों में अलग रास्ता क्या है, उच्च न्यायालय किन बातों पर विचार करता है, सर्वोच्च न्यायालय ने कौन-सी समय-सीमा तय की है, और उच्च न्यायालय से भी जमानत खारिज होने पर क्या विकल्प बचते हैं। यह लेख 29 अक्टूबर 2026 तक की विधिक स्थिति पर आधारित है। यह हमारे अंग्रेज़ी लेख का हिंदी रूप है।
धारा 483 बीएनएसएस के अंतर्गत उच्च न्यायालय की शक्ति
बीएनएसएस की धारा 483(1) उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय, दोनों को यह शक्ति देती है कि वे हिरासत में बंद किसी अभियुक्त को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दें, और मजिस्ट्रेट द्वारा जमानत देते समय लगाई गई शर्तों को हटाएँ या बदलें। यह शक्ति दोनों न्यायालयों के पास है। व्यवहार में अभियुक्त पहले सत्र न्यायालय में अर्जी देता है और वहाँ से जमानत खारिज होने के बाद उच्च न्यायालय जाता है।
उच्च न्यायालय में जमानत अर्जी सत्र न्यायालय के आदेश के विरुद्ध अपील नहीं है। यह एक नई अर्जी है, और उच्च न्यायालय स्वयं तय करता है कि जमानत दी जाए या नहीं। फिर भी सत्र न्यायालय का आदेश और उसमें दिए गए कारण उच्च न्यायालय के सामने रखे जाते हैं और प्रायः उनकी बारीकी से जाँच होती है।
राज्य, सूचनादाता और पीड़ित को सूचना
धारा 483(1) का पहला परंतुक कहता है कि जो अपराध केवल सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है या जिसमें आजीवन कारावास का दंड है, उसके अभियुक्त को जमानत देने से पहले उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय लोक अभियोजक को जमानत अर्जी की सूचना देगा, जब तक कि वह लिखित कारणों सहित यह दर्ज न करे कि ऐसी सूचना देना व्यवहार्य नहीं है। भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 65 या धारा 70(2) के अपराधों में दूसरा परंतुक अर्जी मिलने के पंद्रह दिनों के भीतर लोक अभियोजक को सूचना देना आवश्यक करता है, और धारा 483(2) के अनुसार सुनवाई के समय सूचनादाता या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति की उपस्थिति अनिवार्य है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय नियमावली, 1952 के नियम 18 के अनुसार जमानत अर्जी की सुनवाई से पहले शासकीय अधिवक्ता (गवर्नमेंट एडवोकेट) को उसकी सूचना देनी होती है। वर्ष 2018 के संशोधन से सूचना और अर्जी की सूची में लगने के बीच की न्यूनतम अवधि दस दिन से घटाकर दो दिन कर दी गई। सुनवाई में राज्य की ओर से सामान्यतः अपर शासकीय अधिवक्ता उपस्थित होते हैं।
जहाँ अपराध अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के अंतर्गत है, वहाँ धारा 15क(3) पीड़ित या उसके आश्रित को जमानत की कार्यवाही सहित न्यायालय की कार्यवाही की उचित, सटीक और समय पर सूचना पाने का अधिकार देती है, और धारा 15क(5) उन्हें सुनवाई का अधिकार देती है। हरिराम भांभी बनाम सत्यनारायण (29 अक्टूबर 2021) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि ये अपेक्षाएँ अनिवार्य हैं।
एससी/एसटी एक्ट के मामले: जमानत अर्जी नहीं, अपील
एससी/एसटी एक्ट के मामलों में उच्च न्यायालय जाने का रास्ता अलग है। उस अधिनियम की धारा 14क विशेष न्यायालय या अनन्य विशेष न्यायालय के निर्णय, दंडादेश या आदेश के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील का प्रावधान करती है, और धारा 14क(2) में जमानत देने या न देने का आदेश स्पष्ट रूप से शामिल है। इसलिए विशेष न्यायालय द्वारा जमानत खारिज होने पर उपाय धारा 14क के अंतर्गत अपील है, बीएनएसएस की धारा 483 के अंतर्गत नई जमानत अर्जी नहीं।
10 अक्टूबर 2018 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने इन रे: प्रोविज़न ऑफ़ सेक्शन 14A ऑफ़ एससी/एसटी (प्रिवेंशन ऑफ़ एट्रोसिटीज़) अमेंडमेंट एक्ट, 2015 में अपील के प्रावधान को वैध ठहराया, यह माना कि विशेष अधिनियम सामान्य प्रक्रिया पर प्रभावी है, और ऐसी अपील दाखिल करने की 180 दिनों की बाहरी सीमा को निरस्त किया। पूर्ण पीठ ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के अंतर्गत उच्च न्यायालय की शक्तियाँ समाप्त नहीं होतीं, परंतु उनका प्रयोग केवल असाधारण और विरले मामलों में किया जाना चाहिए।
उच्च न्यायालय किन बातों पर विचार करता है
जमानत से संबंधित कारक सर्वोच्च न्यायालय ने प्रशांत कुमार सरकार बनाम आशीष चटर्जी, (2010) 14 SCC 496 के अनुच्छेद 9 में बताए थे, और बाद में कई बार दोहराए गए हैं, जिसमें जगजीत सिंह बनाम आशीष मिश्रा, (2022) 9 SCC 321 में तीन न्यायाधीशों की पीठ भी शामिल है: क्या यह मानने का प्रथमदृष्टया या उचित आधार है कि अभियुक्त ने अपराध किया; आरोप की प्रकृति और गंभीरता; दोषसिद्धि की स्थिति में दंड की कठोरता; रिहा होने पर अभियुक्त के फरार होने का खतरा; अभियुक्त का चरित्र, आचरण, साधन, स्थिति और प्रतिष्ठा; अपराध दोहराए जाने की संभावना; गवाहों को प्रभावित किए जाने की उचित आशंका; और जमानत से न्याय में बाधा पड़ने का खतरा।
व्यवहार में उच्च न्यायालय यह भी देखता है कि अभियुक्त कितने समय से हिरासत में है, आरोप-पत्र दाखिल हुआ है या नहीं, विचारण (ट्रायल) किस चरण में है, जमानत पा चुके सह-अभियुक्तों की तुलना में अभियुक्त की भूमिका क्या बताई गई है, और कोई आपराधिक इतिहास है या नहीं। जो अर्जी सत्र न्यायालय द्वारा जमानत खारिज करने के विशिष्ट कारणों का उत्तर देती है, वह प्रायः उस अर्जी से अधिक उपयोगी होती है जो वहाँ दिए गए तर्कों को ही दोहराती है।
जहाँ अपराध किसी ऐसे विशेष अधिनियम के अंतर्गत है जिसमें जमानत पर अपने प्रतिबंध हैं, वहाँ वे प्रतिबंध उच्च न्यायालय में भी लागू रहते हैं, जैसे वाणिज्यिक मात्रा वाले अपराधों में एनडीपीएस एक्ट, 1985 की धारा 37 की और धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 की धारा 45 की दोहरी शर्तें। इसके अलावा, यदि बीएनएसएस की धारा 187(3) में निर्धारित अवधि में आरोप-पत्र दाखिल नहीं होता, अर्थात मृत्यु, आजीवन कारावास या कम से कम दस वर्ष के कारावास से दंडनीय अपराधों में नब्बे दिन और अन्य अपराधों में साठ दिन, तो अभियुक्त अर्जी देने और जमानत प्रस्तुत करने पर डिफ़ॉल्ट जमानत का हकदार हो जाता है।
इसमें कितना समय लगता है
जमानत अर्जी के निस्तारण की कोई निश्चित वैधानिक अवधि नहीं है। सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो, (2022) 10 SCC 51 (11 जुलाई 2022) में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि जमानत अर्जियों का निस्तारण दो सप्ताह के भीतर होना चाहिए, सिवाय वहाँ जहाँ कानून अन्यथा कहता हो, और अग्रिम जमानत अर्जियों का निस्तारण छह सप्ताह के भीतर अपेक्षित है, दोनों ही स्थितियों में बीच में आने वाली किसी अर्जी के अधीन। वर्ष 2023 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उस निर्णय के अनुपालन में उत्तर प्रदेश के ज़िला एवं सत्र न्यायाधीशों को जमानत अर्जियों का दो सप्ताह में निस्तारण करने का निर्देश दिया।
उच्च न्यायालय में अर्जी की वास्तविक सुनवाई की तिथि राज्य को सूचना, आवश्यकता होने पर प्रति-शपथपत्र (काउंटर एफ़िडेविट) दाखिल होने और न्यायालय की दैनिक वाद-सूची पर निर्भर करती है। यथार्थवादी अनुमान अर्जी दाखिल होने और सूचीबद्ध होने के बाद ही दिया जा सकता है।
यदि उच्च न्यायालय भी जमानत खारिज कर दे
आगे एक और जमानत अर्जी दाखिल की जा सकती है, परंतु वह परिस्थितियों में बदलाव पर आधारित होनी चाहिए, जैसे आरोप-पत्र का दाखिल होना, हिरासत में लंबी अतिरिक्त अवधि, समान स्थिति वाले सह-अभियुक्तों को जमानत मिलना, या महत्वपूर्ण गवाहों का बयान हो जाना। कल्याण चंद्र सरकार बनाम राजेश रंजन, (2005) 2 SCC 42 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि बाद की जमानत अर्जी सुनने वाला न्यायालय पिछली अर्जियाँ खारिज होने के कारणों पर विचार करे और वे नए आधार दर्ज करे जो भिन्न दृष्टिकोण को उचित ठहराते हैं। शहज़ाद हसन ख़ान बनाम इश्तियाक़ हसन ख़ान, (1987) 2 SCC 684 (28 अप्रैल 1987) में न्यायालय ने कहा कि न्यायिक अनुशासन की माँग है कि बाद की जमानत अर्जी, यदि संभव हो, उसी न्यायाधीश के सामने रखी जाए जिन्होंने पिछली अर्जी तय की थी।
दूसरा विकल्प यह है कि उच्च न्यायालय के जमानत खारिज करने के आदेश को संविधान के अनुच्छेद 136 के अंतर्गत विशेष अनुमति याचिका द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जाए। यह उपाय विवेकाधीन है और सीमित परिस्थितियों में ही उस पर विचार होता है।
जमानत मिलने के बाद
जमानत का आदेश अपने आप रिहाई सुनिश्चित नहीं करता। अभियुक्त या उसके परिवार को संबंधित न्यायालय, सामान्यतः विचारण न्यायालय, के सामने आदेश में अपेक्षित व्यक्तिगत बंधपत्र और ज़मानतदार प्रस्तुत करने होते हैं, जिसके बाद वह न्यायालय जेल को रिहाई आदेश भेजता है। जमानत आदेश की शर्तों, जैसे विचारण न्यायालय में उपस्थिति या यात्रा पर प्रतिबंध, का पालन करना आवश्यक है, क्योंकि उल्लंघन होने पर जमानत निरस्त हो सकती है।
आवश्यक दस्तावेज़
इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जमानत अर्जी तैयार करने के लिए सामान्यतः ये दस्तावेज़ चाहिए: प्राथमिकी (एफ़आईआर) की प्रति; सत्र न्यायालय का जमानत खारिज करने का आदेश, यदि हो सके तो प्रमाणित प्रति, और वहाँ दाखिल की गई जमानत अर्जी; आरोप-पत्र, यदि दाखिल हुआ हो; हिरासत का विवरण, जिसमें गिरफ़्तारी की तिथि और जेल में बिताई गई अवधि शामिल हो; सह-अभियुक्तों को मिले जमानत आदेश; किसी आपराधिक इतिहास का विवरण; और जहाँ उपलब्ध हो, अभियोजन द्वारा आधार बनाई गई चोट रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट या बरामदगी ज्ञापन।
व्यावहारिक सारांश
सत्र न्यायालय से जमानत खारिज होने के बाद बीएनएसएस की धारा 483 (सीआरपीसी की धारा 439 के समान) के अंतर्गत इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जमानत अर्जी दाखिल की जा सकती है। यह नई अर्जी है, अपील नहीं। राज्य को सूचना देनी होती है, और निर्दिष्ट अपराधों में सूचनादाता या पीड़ित को सूचना और सुनवाई का अधिकार है। एससी/एसटी एक्ट के मामलों में उपाय धारा 14क के अंतर्गत अपील है, जमानत अर्जी नहीं। उच्च न्यायालय आरोप की प्रकृति, साक्ष्य, अभियुक्त के फरार होने या गवाहों को प्रभावित करने के जोखिम और हिरासत की अवधि पर विचार करता है। फिर से जमानत खारिज होने पर अगली अर्जी परिस्थितियों में बदलाव पर आधारित होनी चाहिए, और सीमित मामलों में सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका का विकल्प रहता है। हर मामला अपने तथ्यों पर निर्भर करता है, और किसी परिणाम का आश्वासन नहीं दिया जा सकता।
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और विधिक सलाह नहीं है। कोई भी कदम उठाने से पहले लागू कानून और मामले के तथ्यों की जाँच की जानी चाहिए।
Key Authorities Cited
- Satender Kumar Antil v. Central Bureau of Investigation — Supreme Court of India, 2022-07-11, (2022) 10 SCC 51
- Prasanta Kumar Sarkar v. Ashis Chatterjee — Supreme Court of India, (2010) 14 SCC 496 (paras 9)
- Jagjeet Singh v. Ashish Mishra — Supreme Court of India, (2022) 9 SCC 321
- Kalyan Chandra Sarkar v. Rajesh Ranjan — Supreme Court of India, (2005) 2 SCC 42
- Shahzad Hasan Khan v. Ishtiaq Hasan Khan — Supreme Court of India, 1987-04-28, (1987) 2 SCC 684
- Hariram Bhambhi v. Satyanarayan — Supreme Court of India, 2021-10-29
- In Re: Provision of Section 14A of SC/ST (Prevention of Atrocities) Amendment Act, 2015 — High Court of Judicature at Allahabad (Full Bench), 2018-10-10, Criminal Writ-PIL No. 8 of 2018
Statutory Provisions
- Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 — Section 483 (special powers of the High Court and Court of Session regarding bail; corresponds to Section 439 CrPC)
- Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 — Section 187(3) (default bail where the charge-sheet is not filed in time)
- Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 — Section 14A (appeal, including against an order granting or refusing bail) and Section 15A(3) and (5) (rights of victims)
- Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act, 1985 — Section 37
- Prevention of Money Laundering Act, 2002 — Section 45
- Allahabad High Court Rules, 1952 — Rule 18 (notice of bail applications to the Government Advocate)
Frequently Asked Questions
क्या सत्र न्यायालय से जमानत खारिज होने के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अर्जी दी जा सकती है?
हाँ। बीएनएसएस की धारा 483 (सीआरपीसी की धारा 439 के समान) के अंतर्गत इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जमानत अर्जी दाखिल की जा सकती है। यह नई अर्जी है, अपील नहीं, और उच्च न्यायालय स्वयं तय करता है कि जमानत दी जाए या नहीं।
उच्च न्यायालय में जमानत अर्जी पर निर्णय में कितना समय लगता है?
कोई निश्चित वैधानिक अवधि नहीं है। सतेंद्र कुमार अंतिल (2022) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जमानत अर्जियों का निस्तारण सामान्यतः दो सप्ताह में होना चाहिए। वास्तविक सुनवाई राज्य को सूचना, प्रति-शपथपत्र और न्यायालय की वाद-सूची पर निर्भर करती है।
एससी/एसटी एक्ट के मामले में विशेष न्यायालय से जमानत खारिज हो तो क्या करें?
ऐसे मामलों में उपाय एससी/एसटी एक्ट की धारा 14क के अंतर्गत उच्च न्यायालय में अपील है, धारा 483 बीएनएसएस के अंतर्गत नई जमानत अर्जी नहीं। पीड़ित या आश्रित को सूचना और सुनवाई का अधिकार है।
यदि उच्च न्यायालय भी जमानत खारिज कर दे तो क्या विकल्प हैं?
परिस्थितियों में बदलाव, जैसे आरोप-पत्र दाखिल होना या लंबी अतिरिक्त हिरासत, होने पर नई जमानत अर्जी दी जा सकती है। सीमित मामलों में अनुच्छेद 136 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका भी दाखिल की जा सकती है।
जमानत अर्जी के लिए कौन-से दस्तावेज़ चाहिए?
प्राथमिकी की प्रति, सत्र न्यायालय का आदेश और वहाँ की जमानत अर्जी, आरोप-पत्र (यदि दाखिल हो), गिरफ़्तारी की तिथि और हिरासत का विवरण, सह-अभियुक्तों के जमानत आदेश, और किसी आपराधिक इतिहास का विवरण।
Sources & References
- Shahzad Hasan Khan v. Ishtiaq Hasan Khan, 28 April 1987 (Indian Kanoon)
- XXX v. Union Territory of Andaman & Nicobar Islands, 24 August 2023, quoting the Prasanta Kumar Sarkar factors (Supreme Court of India)
Practice area: Criminal cases at the Allahabad High Court: bail, anticipatory bail and quashing